धान की खेती करने वाले किसान पराली से बना सकते है खाद (Pusa Decomposer)। क्या रहेगी खाद बनाने की विधि एवं इसके लाभ, आइए आपको बताते है।
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Pusa Decomposer | खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान है। और धान की कटाई होने के बाद हर साल किसानों द्वारा पराली जलाने जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं।
जिस वजह से दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पंजाब में प्रदूषण की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है। दरअसल हरियाणा, पंजाब और दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की खेती बड़े स्तर पर होती है।
यंत्रीकरण के कारण धान आधारित फसल प्रणाली वाले क्षेत्रों में रबी फसल की बुआई के लिए किसान धान फसल के अवशेषों या पराली को अक्सर जला देते हैं।
इससे किसानों का खेत कम खर्चे एवं समय पर साफ हो जाता है। धान के अवशेषों या पराली की समस्या से निपटने के लिए पूसा डिकम्पोजर एक अच्छा विकल्प है।
पूसा डिकम्पोजर के चलते किसान भाई धान की पराली से खाद बना सकते है, जो गोबर की खाद के समान रिजल्ट देता है। आइए आपको बताते है खाद बनाने की विधि एवं Pusa Decomposer इससे होने वाले लाभ…
धान की पराली प्रबंधन के लिए पूसा डिकम्पोजर बेहतर विकल्प
पूसा डिस्कंपोजर कवकों का मिश्रण है, जो एंजाइमों का स्राव करके पराली में स्थित सेल्यूलोज, लिग्निन और पेक्टिन को पचाकर 15 से 20 दिनों में पराली का अपघटन कर देता है।
इससे धान की पराली या अवशेषों से खाद भी बन जाती है तथा इन्हें जलाने की समस्या का भी एक समाधान हो जाता है। Pusa Decomposer
श्रमिकों की बढ़ती समस्या और गहन कृषि के तहत, समय की बचत हेतु धान आधारित फसल प्रणालियों में यान्त्रिक खेती को अपनाना समय की मांग है।
उत्तर-पश्चिमी भारत में गहन चावल-गेहूं फसल प्रणाली के लिए धान और गेहूं की कटाई मुख्यतः कम्बाइन के द्वारा की जाती है। यह खेत में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष छोड़ देती है। धान की पराली किसानों के लिए एक बड़ी समस्या रही है।
अक्टूबर और नवम्बर में रबी की फसल की बुआई करने के लिए किसानों को अपने खेत धान की पराली से खाली या साफ करने पड़ते हैं। ये फसल अवशेष अगली फसल के लिए जुताई और बुआई के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। Pusa Decomposer
इसलिए किसान अक्सर इन अवशेषों को जलाना पसंद करते हैं। पराली जलाने से किसानों का खेत कम खर्चे एवं समय में खाली या साफ हो जाता है तथा समय पर गेहूं या अन्य किसी फसल की बुआई की जा सकती है।
Pusa Decomposer : फसल अवशेषों की स्थिति नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के अनुसार, भारत प्रत्येक वर्ष औसतन 500 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पन्न करता है। इन फसल अवशेषों का अधिकांश हिस्सा चारे ईंधन औद्योगिक और अन्य घरेलू उद्देश्यों के उपयोग में लिया जाता है।
इसके बाद भी 140 मिलियन टन फसल अवशेष बच जाता है। इसमें से 92 मिलियन टन फसल अवशेष प्रतिवर्ष खेत में ही जला दिया जाता है। पराली जलाने के मुद्दे से निपटने के लिए वर्षों से कई समाधान प्रस्तावित किए गए थे। Pusa Decomposer
इसी क्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित पूसा डिकम्पोजर कैप्सूल का उल्लेख किया जा सकता है। यह पराली को खेत में ही अपघटित कर खाद बना देता है। इसने किसानों की पराली की समस्या के लिए गेम चेंजर का काम किया है।
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क्या है पूसा डिकम्पोजर, कैसे काम और बनाने की विधि..
पूसा डिकम्पोजर सात कवकों का मिश्रण है, जिसे हरे और लाल रंग के कैप्सूल में पैक किया जाता है पूसा डिकम्पोजर कैप्सूल, गुड़ एवं बेसन की सहायता से किण्विन प्रक्रिया ( 8-10 दिनों) द्वारा एक तरल कल्चर अथवा मिश्रण तैयार करके खेत में फसल अवशेषों या धान की पराली पर छिड़क देते हैं। Pusa Decomposer
इसके बाद यह कवक धान की पराली या भूसे में उपस्थित सेल्यूलोज, लिग्निन और पेक्टिन को पचाने अथवा अपघटित करने के लिए एंजाइमों का स्राव करता है।
इससे धान की पराली या अवशेषों का अपघटन 15 से 20 दिनों में हो जाता है तथा यह खाद बन जाती है। यह पराली को जलाने से रोकने का एक समाधान है। पूसा डिकम्पोजर कैप्सूल से कल्चर खेत में उपयोग करने से पहले पूसा डिकम्पोजर का तरल कल्चर तैयार करना होता है। Pusa Decomposer
इसके लिए सर्वप्रथम 5 लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ को उबालकर मिश्रण बना लें। अब इस मिश्रण को चार कोनों वाले बर्तन जैसे ट्रे या टब में ठंडा कर लें। जब मिश्रण हल्का गुनगुना हो जाए, तब इसमें 50 ग्राम बेसन अथवा चने का आटा मिला दें।
इसके बाद पूसा डिकम्पोजर के 4 कैप्सूल तोड़कर इस मिश्रण में डालें तथा लकड़ी की सहायता से अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण के बर्तन को हल्के कपड़े द्वारा ढककर सामान्य तापमान पर रख दें। इस मिश्रण को हिलाएं नहीं।
दो से तीन दिनों के अन्दर मिश्रण की सतह पर मलाईनुमा कवकों की परत बनने लगती है, जो 4 दिनों बाद एक अच्छी परत के रूप में बदल जाती है। अब दोबारा इस मिश्रण में 5 लीटर हल्का गुनगुना बिना बेसन वाला गुड़ का घोल मिला दें तथा कुल 25 लीटर मिश्रण बनने तक यह प्रक्रिया प्रत्येक दो दिनों बाद दोहराते रहें। 25 लीटर मिश्रण बनने के बाद मिश्रण को अच्छी तरह मिलाकर उपयोग में लें, जो एक हैक्टर या 2.5 एकड़ भूमि में छिड़काव करने के लिए पर्याप्त है। Pusa Decomposer
खेत में कल्चर उपयोग 25 लीटर पूसा डिकम्पोजर के मिश्रण को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर एक हैक्टर अथवा 2.5 एकड़ भूमि के फसल अवशेषों या धान की पराली पर छिड़काव करें। इसके बाद फसल अवशेषों या धान की पराली को रोटावेटर की सहायता से जमीन में अच्छी तरह से मिलाकर एक हल्की सिंचाई करें।
पूसा डिकम्पोजर मिश्रण के छिड़काव के लगभग 20 दिनों बाद धान की पराली विघटित हो जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग से कैप्सूल प्राप्त कर सकते हैं। Pusa Decomposer
पूसा डिकम्पोजर के फायदे इस प्रकार है
सामान्य परिस्थितियों में पराली को मिट्टी में मिलाने के बाद विघटन के लिए कम से कम 45 दिन लगते हैं, जबकि पूसा डिकम्पोजर के प्रयोग से यह प्रक्रिया 20 दिनों में हो जाती है। Pusa Decomposer
किसानों को रबी फसलों के लिए जुताई एवं बुआई में आने वाली पराली की बाधा खत्म हो जाती है। इससे किसान गेहूं की बुआई समय पर बिना किसी बाधा के कर सकते हैं।
पराली के प्रबंधन के लिए यह एक कुशल, प्रभावी और सस्ती तकनीक है और इससे पराली जलाने की समस्या से छुटकारा मिल जाता है। Pusa Decomposer
पराली जलाने से निकलने वाली गैंसें, ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। उनसे भी इस प्रकार छुटकारा मिल जाता है।
पराली का मृदा में विघटन मृदा को भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार लाने के साथ-साथ मृदा की उर्वरा शक्ति की क्षमता बढ़ाने में सहायक है। Pusa Decomposer
क्यों नहीं जलानी चाहिए धान की पराली, जानें दुष्प्रभाव
फसल कटाई के बाद खेतों में छोड़ी गई धान की पराली को किसानों द्वारा जलाना पिछले कई वर्षों से चिंता का विषय रहा है। यह प्रक्रिया उत्तरी गंगा के मैदानी क्षेत्रों और दिल्ली जैसे पहले से ही प्रदूषित शहरों में वायु प्रदूषण में अहम् भूमिका निभा रहा है। Pusa Decomposer
पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में फसल अवशेष या पराली को जलाने से निकलने वाला धुआं और जहरीली गैसें पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग एवं मानव में श्वसन संबंधी रोग उत्पन्न करने में सहायक हैं। फसल अवशेष या पराली जलाने के मुख्य प्रतिकूल प्रभावों में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन शामिल है।
यह ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है तथा पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) और स्मॉग का बढ़ता स्तर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। फसल अवशेष या पराली जलाने से कृषि भूमि की जैव विविधता में नुकसान के साथ-साथ मृदा की उर्वरा शक्ति की क्षमता में गिरावट आती है। Pusa Decomposer
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